Sunday, 19 December 2010
गोस्वामी तुलसीदास जी की आध्यात्मिक जन्मस्थली
चित्रकूट की महिमा का वर्णन शब्दों में हो ही नहीं सकता। यहां पर तो प्रेम, आध्यात्म और तप की वह रसधार बहती है कि जो जितना लूट सकता हो उसे उतनी छूट है।
भगवान श्री राम के चरित्र को जन-जन तक पहुंचाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी की आध्यात्मिक जन्मस्थली चित्रकूट है। यहां पर उन्होंने दीक्षा लेकर तप किया और उन्हें दो बार भगवान राम के दर्शन भी यहीं पर हुए। तुलसीकृत श्री राम चरित मानस में जीवन की समस्त समस्याओं के समाधान छिपे हुए हैं। जो भी व्यक्ति इसे जिस रूप में देखता है उसे वैसे ही फल की प्राप्ति होती है।
Tuesday, 27 July 2010
Thursday, 10 September 2009
राम की लीलाएं


राम एक आदर्श पुत्र, पति और प्रजापालक थे। वे सभी इंद्रियों को जीतने वाले, तेजस्वी, बुद्धिमान, पराक्रमी, विद्वान, नीति-निपुण और मर्यादा पुरुषोत्तम थे। सच तो यह है कि राम के जीवन की लीलाएं हमारे लिए खास महत्व इसलिए भी रखती हैं, क्योंकि उनसे हमारी संस्कृति और लोक-व्यवहार जुडा हुआ है।
यदि हम उनके कर्मो और लीलाओं से प्रेरणा लें, तो हमारा अशांत और अस्थिर जीवन सुखद और सरल हो सकता है।
शबरी के जूठे बेर
एक बार राम की परम भक्त शबरी ने उन्हें जूठे बेर खाने को दिया। राम ने तुरंत उनके बेर को खा लिया। राम ने शबरी के बेरों को स्वीकार कर हमारे सामने प्रेम और समानता का आदर्श प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, सभी इंसान बराबर हैं, कोई बडा या छोटा नहीं है। एक दूसरे घटनाक्रम में राम ने लक्ष्मण को मृत्यु शैय्यापर पडे रावण से उपदेश लेने की भी सलाह दी।
साथ ही, उन्होंने लक्ष्मण को रावण के चरणों के पास बैठ कर ज्ञान प्राप्त करने को कहा, क्योंकि ज्ञान किसी भी व्यक्ति से और किसी भी स्थान पर लिया जा सकता है। ज्ञान देने वाला हमेशा श्रेष्ठ होता है, इसलिए लेने वाले के मन में समर्पण का भाव होना चाहिए। कैकेयीका वचन
राम के पिता दशरथ ने माता कैकेईको वचन दिया कि राम को चौदह वर्षो का वनवास मिले। उनके दिए गए वचन का मान बना रहे, इसके लिए राम ने न केवल हंसते-हंसते चौदह वर्षो का वनवास स्वीकार कर लिया, बल्कि छोटे भाई भरत को राज सिंहासन देने का निर्णय भी ले लिया।
उन्होंने अपनी मां की आज्ञा का पालन, पिता के वचन का मान, भाइयों के प्रति अपार स्नेह का भाव और सुख-ऐश्वर्य को त्याग कर हमारे सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया है। यदि हम उनके इन सभी भावों को अपने जीवन में उतार लें, तो न केवल हम स्वयं सुखी हो सकेंगे, बल्कि दूसरों को भी सुख दे सकेंगे। सीता के प्रति आदर
यदि राम चाहते, तो सीता हरण के बाद दूसरा विवाह कर अपने जीवन को सरल व सुखद बना सकते थे। दरअसल, उस समय अनेक शादियों का प्रचलन भी था। लेकिन उन्होंने उसी पथ का अनुसरण किया, जो आम लोगों के लिए अनुकरणीय बने।
यही नहीं, वनवास की अवधि के बाद जब उनका राज्याभिषेक किया गया, तो उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को बराबर का दर्जा दिया। साथ ही, वे पत्नी के प्रति आजीवन प्रेम के संकल्प से भी कभी विमुख नहीं हुए और इसलिए भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। रावण से युद्ध
राम विष्णु के अवतार थे और उनके पास हर तरह की चमत्कारी शक्तियां मौजूद थीं। लेकिन इन शक्तियों का प्रयोग उन्होंने अपने लाभ के लिए कभी नहीं किया। यहां तक कि रावण के साथ युद्ध में भी वे साधारण मानव ही बने रहे। इस कार्य में उन्होंने सभी जीवों की सहायता भी ली।
हालांकि वे युद्ध नहीं चाहते थे, लेकिन रावण के अत्याचार से पृथ्वी को मुक्त कराने के लिए उन्हें युद्ध करना ही पडा। सुग्रीव की मित्रता
राम ने वानर राज सुग्रीव के साथ न केवल मित्रता की, बल्कि उनका हर कदम पर साथ दिया। उन्होंने न केवल एक अच्छे मित्र का उदाहरण दिया है, बल्कि हनुमान के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार निभाकर गुरु-शिष्य, भगवान-भक्त के रिश्ते को और भी मजबूत व समृद्ध किया है। वनवास के दौरान राम ने हमेशा कोल, किरात, भील आदि के साथ समता का व्यवहार किया। प्राणियों के प्रति प्रेम
सीता को तलाशने के लिए वानर एवं रीछ की सहायता इसलिए ली, ताकि इनको भी अपनी महत्ता का पता चले। राम की शरण में आए हुए हर प्राणी की रक्षा का उदाहरण भी अनुपम है। चाहे वह बाली के भाई सुग्रीव हों या नन्हीं जीव गिलहरी, सबकी उन्होंने रक्षा की।
युद्ध के दौरान रावण ने विभीषण पर अमोघ शक्ति का प्रहार किया। इस पर राम ने अपनी शरण में आए विभीषण की रक्षा करने के लिए खुद ही उस शक्ति को अपनी छाती पर झेल लिया। हम देखते हैं कि राम का व्यक्तित्व हम सबों के लिए आज भी प्रेरणादायक है। उनके गुणों को अपने जीवन में अपनाकर हम समाज का कल्याण कर सकते हैं। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को रामनवमी उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। इस वर्ष यह तिथि 3अप्रैल है।
.चित्रकूट में लिखा गया था अयोध्या कांड
गोस्वामी तुलसीदास बन श्री राम कथा का अमर गायक बन पूरे विश्व में आदर का पात्र बन जायेगा, यह राजापुर के निवासियों ने कभी सोचा भी न था। यह बात और थी कि यह विलक्षण योगी स्वामी नरहरिदास को राजापुर के ही समीप हरिपुर के पास एक पेड़ के नीचे मिल गया और वे उसे उठाकर अपने साथ ले गये। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम व उनकी महिमा से परिचित कराने के साथ ही उन्होंने राम बोला को संस्कार व काशी ले जाकर शिक्षा दी तब वह गोस्वामी तुलसीदास बन सके।वैसे तो संत तुलसीदास चित्रकूट में अपने गुरु स्थान नरहरिदास आश्रम पर कई वर्षो तक रहे और यहां पर उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम राम व भ्राता लक्ष्मण के दो बार साक्षात् दर्शन भी किये। उन्होंने यहीं पर रहकर रामचरित मानस का पूरा अयोध्या कांड व विनय पत्रिका पूर्वाद्ध भी लिखा।
अभी तक ज्यादातर लोग सिर्फ यही जानते हैं कि तुलसीदास की हस्तलिखित रामचरित मानस की प्रति सिर्फ राजापुर में है पर इस दुर्लभ प्रति को चित्रकूट परिक्रमा मार्ग स्थित नरहरिदास आश्रम में देखा जा सकता है। यही स्थान गोस्वामी तुलसीदास जी का गुरु स्थान है, इसे महल मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर पिछले चालीस वर्षो से मंदिर की व्यवस्था का काम देखने वाले स्वामी रघुवर दास बताते हैं कि स्वामी नरहरिदास ने अपने जीवन काल का अधिकांश समय चित्रकूट में ही व्यतीत किया। गोस्वामी जी चित्रकूट में ही पले व बडे़ हुए। वह हमेशा अपने गुरु स्थान पर आते रहे और यहां पर भी वे रामचरित मानस के साथ ही अन्य ग्रंथों की रचना में तल्लीन रहते थे।
उन्होंने रामचरित मानस की एक मूल हस्तलिखित प्रति दिखाते हुए कहा कि यह गोस्वामी जी के हाथ की लिखी गयी प्रति है। इसके लगभग पांच सौ पेज अभी भी सुरक्षित हैं जिसमें सभी कांडों के थोड़े-थोड़े पन्ने हैं। आर्थिक अभावों के चलते वे इसका संरक्षण कराने में अपने आपको असमर्थ बताते हैं। कहा कि न तो मंदिर में आमदनी का कोई स्रोत है और न ही उनके पास किसी तरह की मदद आती है।
संत तुलसीदास का लगाया गया पीपल का पेड़ भी यहीं पर है जो उचित संरक्षण के अभाव में गिरने के कगार पर है। चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बाबा तुलसी दास का लगाया पेड़ तो सबकी नजरों के सामने ही है पर उसके संरक्षण और संवर्धन का कोई प्रयास नही करता।
Monday, 3 August 2009

वर्तमान समय में श्रीरामसेतुसर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा 8अक्टूबर 2002को रामेश्वरमके समीप भारत और श्रीलंका के मध्य समुद्र में एक सेतु खोज लेने के बाद श्रीरामसेतुको काल्पनिक कहकर इसके अस्तित्व को नकार सकना संभव नहीं है। सीताहरण के बाद श्रीराम की वानरसेनाने लंका पर चढाई करने के लिए समुद्र पर सेतु बनाया था। राम-नाम के प्रताप से पत्थर पानी पर तैरने लगे।
रामसेतुका धार्मिक महत्व केवल इससे ही जाना जा सकता है कि स्कन्दपुराणके ब्रह्मखण्डमें इस सेतु के माहात्म्य का बडे विस्तार से वर्णन किया गया है। नैमिषारण्य में ऋषियों के द्वारा जीवों की मुक्ति का सुगम उपाय पूछने पर सूत जी बोले-
दृष्टमात्रेरामसेतौमुक्ति: संसार-सागरात्।
हरे हरौचभक्ति: स्यात्तथापुण्यसमृद्धिता।
रामसेतु के दर्शनमात्रसे संसार-सागर से मुक्ति मिल जाती है। भगवान विष्णु और शिव में भक्ति तथा पुण्य की वृद्धि होती है। इसलिए यह सेतु सबके लिए परम पूज्य है।
सेतु-महिमा का गुणगान करते हुए सूतजीशौनकआदि ऋषियों से कहते हैं- सेतु का दर्शन करने पर सब यज्ञों का, समस्त तीर्थो में स्नान का तथा सभी तपस्याओं का पुण्यफलप्राप्त होता है। सेतु-क्षेत्र में स्नान करने से सब प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा भक्त को मरणोपरांत वैकुण्ठ में प्रवेश मिलता है। सेतुतीर्थका स्नान अन्त:करण को शुद्ध करके मोक्ष का अधिकारी बना देता है। पापनाशक सेतुतीर्थमें निष्काम भाव से किया हुआ स्नान मोक्ष देता है। जो मनुष्य धन-सम्पत्ति के उद्देश्य से सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह सुख-समृद्धि पाता है। जो विद्वान चारों वेदों में पारंगत होने, समस्त शास्त्रों का ज्ञान और मंत्रों की सिद्धि के विचार से सर्वार्थसिद्धिदायकसेतुतीर्थमें स्नान करता है, उसे मनोवांछित सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। जो भी सेतुतीर्थमें स्नान करता है, वह इहलोक और परलोक में कभी दु:ख का भागी नहीं होता। जिस प्रकार कामधेनु, चिन्तामणि तथा कल्पवृक्ष समस्त अभीष्ट वस्तुओं को प्रदान करते हैं, उसी प्रकार सेतु-स्नान सब मनोरथ पूर्ण करता है।
रामसेतुके क्षेत्र में अनेक तीर्थ स्थित हैं अत:स्कन्दपुराणमें सेतुयात्राका क्रम एवं विधान भी वर्णित है। सेतुतीर्थमें पहुंचने पर सेतु की वन्दना करें-
रघुवीरपदन्यासपवित्रीकृतपांसवे।
दशकण्ठशिरश्छेदहेतवेसेतवेनम:॥
केतवेरामचन्द्रस्यमोक्षमार्गैकहेतवे।
सीतायामानसाम्भोजभानवेसेतवेनम:॥
श्रीरघुवीर के चरण रखने से जिसकी धूलि परम पवित्र हो गई है, जो दशानन रावण के सिर कटने का एकमात्र हेतु है, उस सेतु को नमस्कार है। जो मोक्षमार्गका प्रधान हेतु तथा श्रीरामचन्द्रजीके सुयश को फहरानेवालाध्वज है, सीताजीके हृदयकमलके खिलने के लिए सूर्यदेव के समान है, उस सेतु को मेरा नमस्कार है।
श्रीरामचरितमानसमें स्वयं भगवान श्रीराम का कथन है-
मम कृत सेतु जो दरसनुकरिही।
सो बिनुश्रम भवसागर तरिही॥
जो मेरे बनाए सेतु का दर्शन करेगा, वह कोई परिश्रम किए बिना ही संसाररूपीसमुद्र से तर जाएगा। श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण के युद्धकाण्डके 22वेंअध्याय में लिखा है कि विश्वकर्मा के पुत्र वानरश्रेष्ठनल के नेतृत्व में वानरों ने मात्र पांच दिन में सौ योजन लंबा तथा दस योजन चौडा पुल समुद्र के ऊपर बनाकर रामजी की सेना के लंका में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। यह अपने आपमें एक विश्व-कीर्तिमान है। आज के इस आधुनिक युग में नवीनतम तकनीक के द्वारा भी इतने कम समय में यह कारनामा कर दिखाना संभव नहीं लगता।
महíष वाल्मीकि रामसेतुकी प्रशंसा में कहते हैं- अशोभतमहान् सेतु: सीमन्तइवसागरे।वह महान सेतु सागर में सीमन्त(मांग)के समान शोभित था। सनलेनकृत: सेतु: सागरेमकरालये।शुशुभेसुभग: श्रीमान् स्वातीपथइवाम्बरे॥मगरों से भरे समुद्र में नल के द्वारा निíमत वह सुंदर सेतु आकाश में छायापथके समान सुशोभित था। नासा के द्वारा अंतरिक्ष से खींचे गए चित्र से ये तथ्य अक्षरश:सत्य सिद्ध होते हैं।
स्कन्दपुराणके सेतु-माहात्म्य में धनुष्कोटितीर्थ का उल्लेख भी है-
दक्षिणाम्बुनिधौपुण्येरामसेतौविमुक्तिदे।
धनुष्कोटिरितिख्यातंतीर्थमस्तिविमुक्तिदम्॥
दक्षिण-समुद्र के तट पर जहां परम पवित्र रामसेतुहै, वहीं धनुष्कोटिनाम से विख्यात एक मुक्तिदायक तीर्थ है। इसके विषय में यह कथा है-भगवान श्रीराम जब लंका पर विजय प्राप्त करने के उपरान्त भगवती सीता के साथ वापस लौटने लगे तब लंकापति विभीषण ने प्रार्थना की- प्रभो! आपके द्वारा बनवाया गया यह सेतु बना रहा तो भविष्य में इस मार्ग से भारत के बलाभिमानीराजा मेरी लंका पर आक्रमण करेंगे। लंका-नरेश विभीषण के अनुरोध पर श्रीरामचन्द्रजीने अपने धनुष की कोटि (नोक) से सेतु को एक स्थान से तोडकर उस भाग को समुद्र में डुबो दिया। इससे उस स्थान का नाम धनुष्कोटि हो गया। इस पतितपावनतीर्थ में जप-तप, स्नान-दान से महापातकोंका नाश, मनोकामना की पूर्ति तथा सद्गति मिलती है। धनुष्कोटिका दर्शन करने वाले व्यक्ति के हृदय की अज्ञानमयीग्रंथि कट जाती है, उसके सब संशय दूर हो जाते हैं और संचित पापों का नाश हो जाता है। यहां पिण्डदान करने से पितरोंको कल्पपर्यन्ततृप्ति रहती है। धनुष्कोटितीर्थ में पृथ्वी के दस कोटि सहस्र(एक खरब) तीर्थो का वास है।
वस्तुत:रामसेतुमहातीर्थहै। विद्वानों ने इस सेतु को लगभग 17,50,000साल पुराना बताया है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में निर्दिष्ट काल-गणना के अनुसार यह समय त्रेतायुगका है, जिसमें भगवान श्रीराम का अवतार हुआ था। सही मायनों में यह सेतु रामकथा की वास्तविकता का ऐतिहासिक प्रमाण है। समुद्र में जलमग्न हो जाने पर भी रामसेतुका आध्यात्मिक प्रभाव नष्ट नहीं हुआ है।
स्कंदपुराण,कूर्मपुराणआदि पुराणों में भगवान शिव का वचन है कि जब तक रामसेतुकी आधारभूमितथा रामसेतुका अस्तित्व किसी भी रूप में विद्यमान रहेगा, तब तक भगवान शंकर सेतुतीर्थमें सदैव उपस्थित रहेंगे। अत:श्रीरामसेतुआज भी दिव्य ऊर्जा का स्रोत है। पुरातात्विक महत्व की ऐसी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षण प्रदान करते हुए हमें उसकी हर कीमत पर रक्षा करनी चाहिए। यह सेतु श्रीराम की लंका- विजय का साक्षी होने के साथ एक महातीर्थभी है।
जा पर विपदा परत है, सो आवत यहिदेश।


विंध्यपर्वत के उत्तर में है चित्रकूट धाम। यह न केवल एक धार्मिक स्थान है, बल्कि अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण भी काफी चर्चित है।
आध्यात्मिक शांति :चित्रकूट पर्वत मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों राज्यों की सीमाओं को घेरता है। वनवास के दौरान भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ सबसे अधिक समय तक यहीं निवास किया था। यात्रियों को चित्रकूट गिरि, स्फटिक शिला, भरत कूप, चित्रकूट-वन, गुप्त गोदावरी,मंदाकिनी [पयस्विनी] की यात्रा करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है।
चित्रकूट गिरि को कामद गिरि भी कहते हैं, क्योंकि इस पर्वत को राम की कृपा प्राप्त हुई थी। राम-भक्तों का विश्वास है कि कामद गिरि के दर्शन मात्र से दुख समाप्त हो जाते हैं। इसका एक और नाम कामतानाथभी है। अनुसूइयाकी तपोभूमि :चित्रकूट में पयस्विनी नदी है, जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। इसी के किनारे स्फटिक शिला पर बैठ कर राम ने मानव रूप में कई लीलाएं कीं। इसी स्थान पर राम ने फूलों से बने आभूषण से सीता को सजाया था। पयस्विनी के बायीं ओर प्रमोद वन है, जिससे आगे जानकी कुंड है। यहां स्थित अनुसूइयाआश्रम महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूइयाकी तपोभूमि कहलाती है। कहते हैं कि अत्रि की प्यास बुझाने के लिए अपने तप से अनुसूइयाने पयस्विनी को प्रगट कर लिया। गुप्त गोदावरीकी विशाल गुफामें सीताकुंड बना हुआ है। कामदगिरिके पीछे लक्ष्मण पहाडी स्थित है, जहां एक लक्ष्मण मंदिर है। इसके अलावा, चित्रकूट में बांके सिद्ध, पम्पासरोवर, सरस्वती नदी (झरना), यमतीर्थ,सिद्धाश्रम,हनुमान धारा आदि भी है। राम-भक्त कहते हैं कि राम जिस स्थान पर रहते हैं, वह स्थान ही उनके लिए अयोध्या के समान हो जाता है।
पयस्विनी चित्रकूट की अमृतधारा के समान है। मंदाकिनी नाम से जानी जाने वाली पयस्विनी को कामधेनु और कल्पतरु के समान माना जाता है। शिवपुराणके रुद्रसंहितामें भी पयस्विनी का उल्लेख है। तुलसी-रहीम की मित्रता :वाल्मीकि मुनि ने चित्रकूट की खूब प्रशंसा की है। तुलसीदास ने माना है कि यदि कोई व्यक्ति छह मास तक पयस्विनी के किनारे रहता है और केवल फल खाकर राम नाम जपता रहता है, तो उसे सभी तरह की सिद्धियां मिल जाती हैं।
रामायण और गीतावलीमें भी चित्रकूट की महिमा बताई गई है। दरअसल, यही वह स्थान है, जहां भरत राम से मिलने आते हैं और पूरी दुनिया के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं। यही वजह है कि इस स्थान पर तुलसी ने भरत के चरित्र को राम से अधिक श्रेष्ठ बताया है। देश में सबसे पहला राष्ट्रीय रामायण मेला चित्रकूट में ही शुरू किया गया। तुलसी-रहीम की मित्रता की कहानी आज भी यहां बडे प्रेम से न केवल कही, बल्कि सुनी भी जाती है।
रहीम ने कहा-जा पर विपदा परत है, सो आवत यहिदेश।